Farakka Water Treaty: फरवरी में होने वाले आम चुनावों के बाद बांग्लादेश में बनने वाली नई सरकार के सामने भारत के साथ संबंधों को लेकर सबसे अहम और संवेदनशील मुद्दों में से एक फरक्का जल-बंटवारा संधि का नवीनीनीकरण होगा। वर्ष 2026 में समाप्त हो रही इस संधि में स्वतः विस्तार का कोई प्रावधान नहीं है, ऐसे में दोनों देशों को एक बार फिर गंगा जल के बंटवारे को लेकर नए सिरे से बातचीत की मेज पर आना होगा। यह प्रक्रिया न केवल द्विपक्षीय संबंधों की दिशा तय करेगी, बल्कि क्षेत्रीय जल कूटनीति की भी अहम परीक्षा साबित होगी।
Farakka Water Treaty: भारत-बांग्लादेश संबंधों का एक संवेदनशील केंद्र
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में स्थित फरक्का बैराज दशकों से भारत-बांग्लादेश संबंधों का एक संवेदनशील केंद्र रहा है। इसका निर्माण मुख्य रूप से गंगा का पानी हुगली नदी में मोड़कर कोलकाता बंदरगाह में गाद जमने की समस्या को दूर करने और नौवहन क्षमता बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया था। हालांकि, यही परियोजना आगे चलकर दक्षिण एशिया के सबसे जटिल और लंबे समय से चले आ रहे सीमा-पार जल विवादों में से एक बन गई।
Farakka Water Treaty: फरक्का बैराज 1975 में हुआ था तैयार
फरक्का बैराज की परिकल्पना 1950 के दशक में की गई थी और इसका निर्माण 1975 में पूरा हुआ। बैराज से गंगा का अधिकतम 40,000 क्यूसेक पानी हुगली नदी में मोड़ने की क्षमता रखी गई थी। बांग्लादेश, जो उस समय पूर्वी पाकिस्तान था, को शुरू से ही आशंका रही कि इससे शुष्क मौसम के दौरान उसके हिस्से में पानी की भारी कमी हो जाएगी, जिसका सीधा असर कृषि, मत्स्य पालन, पर्यावरण और आंतरिक नौवहन पर पड़ेगा।
अप्रैल 1975 में बैराज के संचालन के साथ ही, जब बांग्लादेश गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था, दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया। दीर्घकालिक समझौते के अभाव में 1970 और 1980 के दशकों में अस्थायी व्यवस्थाएं की गईं, लेकिन आपसी अविश्वास बना रहा। इस पूरे दौर में फरक्का भारत-बांग्लादेश संबंधों में लगातार विवाद का विषय बना रहा।
Farakka Water Treaty: क्या है समझौता
दिलचस्प रूप से, फरक्का से जुड़े दोनों बड़े समझौते ऐसे समय पर हुए, जब दोनों देशों में नई-नई सरकारें सत्ता में आई थीं। पहला “फरक्का में गंगा जल बंटवारा समझौता” 7 नवंबर 1977 को ढाका में हुआ था। उससे कुछ महीने पहले ही भारत में मार्च 1977 में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे, जबकि अप्रैल 1977 में मेजर जनरल जियाउर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने थे।
दूसरा और सबसे अहम समझौता 12 दिसंबर 1996 को हुआ, जब भारत के प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना दोनों ही अपने-अपने पदों पर लगभग छह महीने पहले ही आए थे। यह संधि 30 वर्षों के लिए लागू की गई और इसके तहत जनवरी से मई के बीच शुष्क मौसम में गंगा जल के बंटवारे का एक विस्तृत ढांचा तैयार किया गया। फरक्का में 10-दिवसीय अवधि के औसत जल प्रवाह के आधार पर पानी के बंटवारे की व्यवस्था तय की गई, जिसमें कुछ परिस्थितियों में दोनों देशों को न्यूनतम 35,000 क्यूसेक पानी की गारंटी दी गई।
1996 की संधि को व्यापक रूप से एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया, क्योंकि इससे लंबे समय से चले आ रहे तनाव में काफी कमी आई। इसके क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक संयुक्त समिति बनाई गई, जिसे तकनीकी विवादों के समाधान की जिम्मेदारी भी दी गई। हालांकि, इसके बावजूद व्यवहार में कई चुनौतियां सामने आती रहीं।
Farakka Water Treaty: बीते वर्षों में बदलाव
बीते वर्षों में जलवायु परिवर्तन, हिमनदों के पिघलने, मानसून की अनिश्चितता और भारत के विभिन्न राज्यों में बढ़ते जल उपयोग के कारण शुष्क मौसम में गंगा का प्रवाह लगातार दबाव में रहा है। बांग्लादेश का आरोप रहा है कि उसे कई बार, खासकर सूखे वर्षों में, तय हिस्से से कम पानी मिलता है, जबकि भारत जलवैज्ञानिक सीमाओं और प्राकृतिक प्रवाह में कमी का हवाला देता रहा है।
पिछले एक दशक में भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, संपर्क, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके बावजूद जल का मुद्दा बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में आज भी अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है। वहां की जनभावना में भारत की अपस्ट्रीम परियोजनाओं को लेकर संदेह बना रहता है। इसके साथ ही, एक दशक से अधिक समय से लंबित तीस्ता नदी जल-विवाद ने भी इस धारणा को और जटिल किया है।
Farakka Water Treaty: भारत के सामने झुकेगा बांग्लादेश
इस बार परिस्थितियां पहले से अलग हैं। भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक स्थिर और मजबूत सरकार है, जबकि बांग्लादेश लगभग 17 महीनों की राजनीतिक अनिश्चितता के बाद लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में फरक्का जल संधि का नवीनीकरण दोनों देशों के बीच आपसी भरोसे, रणनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय स्थिरता की वास्तविक कसौटी साबित होगा। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या दोनों पक्ष आपसी सहमति से आगे बढ़ते हैं या जल कूटनीति एक बार फिर द्विपक्षीय संबंधों की सबसे कठिन चुनौती बनकर उभरती है।