Iran: ओमान और ईरान के रिश्ते 1970 के दशक से मजबूत रहे हैं। धोफर विद्रोह के दौरान ओमान के तत्कालीन शासक सुल्तान काबूस बिन सईद को मोहम्मद रज़ा पहलवी (ईरान के शाह) ने सैन्य मदद दी थी। इस सहयोग ने मस्कट और तेहरान के बीच गहरे रणनीतिक और सुरक्षा संबंधों की नींव रखी।
1979 की ईरानी क्रांति के बाद जब कई खाड़ी देशों ने ईरान से दूरी बना ली, तब भी ओमान ने संतुलित और संवाद-आधारित नीति जारी रखी। यही भरोसा दोनों देशों के बीच दशकों तक कायम रहा।
‘Iran: मिडिल ईस्ट का स्विट्जरलैंड’
ओमान को अक्सर ‘मिडिल ईस्ट का स्विट्जरलैंड’ कहा जाता है। वह Gulf Cooperation Council (GCC) का सदस्य होने के बावजूद ईरान-विरोधी गठबंधनों से दूरी बनाए रखता है। मस्कट ने हमेशा गैर-हस्तक्षेप और संतुलित कूटनीति को प्राथमिकता दी है।
हमला करना क्यों होता महंगा सौदा
तेहरान के नज़रिए से ओमान पर हमला करना रणनीतिक रूप से नुकसानदायक होता। ओमान उन गिने-चुने देशों में है जो संकट के समय भी संवाद के रास्ते खुले रखते हैं। ऐसे में उस पर हमला करना ईरान के लिए कूटनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है।
भौगोलिक दृष्टि से भी ओमान और ईरान मिलकर Strait of Hormuz की निगरानी करते हैं, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। इस क्षेत्र में अस्थिरता दोनों देशों के आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती है।
आर्थिक और सामरिक हित
ईरान-ओमान गैस पाइपलाइन जैसे प्रस्ताव दोनों देशों के आर्थिक सहयोग को दर्शाते हैं। ओमान, ईरान के लिए वैश्विक बाजार तक पहुंच का एक संभावित मार्ग भी है। इसके अलावा, पर्यटन, व्यापार और समुद्री सुरक्षा में भी दोनों देशों के साझा हित जुड़े हैं।
संतुलित विदेश नीति का असर
ओमान की विदेश नीति लंबे समय से संतुलन, शांति और संवाद पर आधारित रही है। उसने क्षेत्रीय विवादों में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से परहेज किया है। यही नीति मौजूदा संकट में भी उसके लिए सुरक्षा कवच साबित हुई है।