Bihar के ऐसे गांव, जिनके नाम सुनकर कान बंद कर लेंगे आप

Bihar Villages: बिहार में 45 हजार से ज्यादा गांव हैं, लेकिन रोहतास जिले में दर्जनभर से ज्यादा ऐसे गांव मौजूद हैं, जिनके नाम सुनकर लोग आज भी असहज महसूस करते हैं। इन गांवों के नाम न सिर्फ बोलने में शर्मिंदगी पैदा करते हैं, बल्कि बाहर पढ़ाई या नौकरी के सिलसिले में जाने पर ग्रामीणों को अपनी पहचान छिपाने तक की नौबत आ जाती है। ईटीवी भारत की टीम जब रोहतास के ऐसे ही इलाकों में पहुंची तो ग्रामीणों का दर्द खुलकर सामने आया।

Bihar Villages: ‘नाम ऐसा हो जिसे शान से बताया जा सके’

पूर्व में नचनिया और अब काशीपुरी गांव के निवासी श्रीराम तिवारी बताते हैं कि गांव का नाम व्यक्ति की पहचान होता है।

“पहले जब भी कहीं अपने गांव का नाम बताते थे तो झिझक होती थी। नचनिया नाम सुनते ही लोग मजाक उड़ाते थे। अब नाम बदलकर काशीपुरी हो गया है तो गर्व महसूस होता है।”

Bihar Villages: ‘जानवरों के नाम पर गांव, बनती है मजाक’

राजपुर प्रखंड के सुअरा गांव के निवासी प्रमोद तिवारी कहते हैं कि गांव या शहर का नाम उसकी छवि तय करता है।

“सुअरा एक जानवर का नाम है। इसे सुनते ही लोग नाक-भौंह सिकोड़ लेते हैं। ऐसे नाम से हमेशा शर्मिंदगी होती है।”

Bihar Villages: राजपुर प्रखंड में सबसे ज्यादा आपत्तिजनक नाम

रोहतास जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर राजपुर प्रखंड में कई ऐसे गांव हैं, जिनके नाम बदलने की मांग तेज हो रही है। इनमें सुअरा, नचनिया, पकड़ी टोला, बरना, हुसैनाबाद, सुल्तानपुर जैसे नाम शामिल हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन नामों के कारण सामाजिक रूप से उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है।

Bihar Villages: कैमूर पहाड़ी और डेहरी में भी स्थिति वही

कैमूर पहाड़ी क्षेत्र में (Bihar Villages) बंडा, नकटी, सुअरमनवा, बजरमनवा, कपर फुट्टी, लौड़ी जैसे गांवों के नाम आज भी लोगों को असहज करते हैं। वहीं डेहरी प्रखंड में भेड़िया और रंगबाज सुअरा जैसे नाम चर्चा में हैं।

Bihar Villages: तुर्की टोला बना देवीपुर, बदली पहचान

इलाके के वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र मिश्र बताते हैं कि ऐसे नाम ऐतिहासिक रूप से चले आ रहे हैं, लेकिन समय के साथ इन्हें बदलने की जरूरत है।

“रोहतास प्रखंड में तुर्की टोला का नाम बदलकर देवीपुर कर दिया गया है। इससे ग्रामीणों में सकारात्मक बदलाव आया है। ऐसे अन्य गांवों के नाम भी बदले जाने चाहिए।”

Bihar Villages: अब प्रशासन से उम्मीद

ग्रामीणों का कहना है कि नाम बदलने से उनकी सामाजिक पहचान बेहतर होगी और आने वाली पीढ़ियों को शर्मिंदगी का सामना नहीं करना पड़ेगा। अब सभी की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मांग को कितनी गंभीरता से लेता है।

 

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