Nawada Durga Mandir: यहां सिंहासन पूजा की अनूठी परंपरा, 400 वर्षों से कायम है मां हयहट्ट देवी के प्रति आस्था

Nawada Durga Mandir: बिहार के दरभंगा जिले के बेनीपुर प्रखंड स्थित नवादा गांव का प्रसिद्ध हयहट्ट देवी मंदिर अपनी विशिष्ट पूजा परंपरा और ऐतिहासिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मां दुर्गा की प्रतिमा के बजाय उनके सिंहासन की पूजा की जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। चैती और शारदीय नवरात्र के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। बिहार के मिथिलांचल के अलावा नेपाल से भी बड़ी संख्या में भक्त मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक मां के सिंहासन की आराधना करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

Nawada Durga Mandir: जंगल में प्रकट हुई थीं ‘अंकुरित भगवती’

स्थानीय लोगों के अनुसार, हयहट्ट देवी को ‘अंकुरित भगवती’ के रूप में पूजा जाता है। मंदिर की स्थापना को लेकर प्रचलित लोककथा लगभग चार सौ वर्ष पुरानी बताई जाती है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर आज मंदिर स्थापित है, वहां कभी घना जंगल हुआ करता था। आसपास के ग्रामीण अपनी गायों को चराने के लिए इसी जंगल में लेकर आते थे।

इसी दौरान एक गाय रोजाना एक खास स्थान पर अपना दूध गिरा देती थी। जब ग्रामीणों ने इस घटना पर ध्यान दिया और उस जगह की जांच की, तो उन्हें वहां कुछ असाधारण होने का आभास हुआ। इसके बाद उस स्थान की सफाई कराई गई और वहां लकड़ी तथा फूस की मदद से एक छोटी झोपड़ी बनाई गई। ग्रामीणों ने इसी स्थान पर देवी की पूजा शुरू कर दी।

समय के साथ मां के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ती गई और दूर-दूर से भक्त यहां आने लगे। इसके बाद ग्रामीणों ने आपसी सहयोग और सामूहिक चंदे से मंदिर का निर्माण कराया। धीरे-धीरे यह स्थान हयहट्ट भगवती के प्रसिद्ध धाम के रूप में स्थापित हो गया।

नवादा गांव का संबंध प्राचीन हयहट्ट राजा के ‘डीह’ से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इसी ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण देवी को हयहट्ट भगवती के नाम से जाना जाने लगा। गांव में मौजूद कुछ पुराने स्थल और संरचनाएं आज भी यहां के अतीत की याद दिलाते हैं।

Nawada Durga Mandir: देवी की प्रतिमा नहीं, सिंहासन की होती है पूजा

हयहट्ट देवी मंदिर की पहचान यहां निभाई जाने वाली सिंहासन पूजा की परंपरा है। आमतौर पर देवी मंदिरों में प्रतिमा की पूजा की जाती है, लेकिन नवादा के इस मंदिर में मां के सिंहासन को ही आराधना का केंद्र माना जाता है। स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां इसी सिंहासन में विराजमान हैं और उनकी कृपा से भक्तों की इच्छाएं पूरी होती हैं। मंदिर में प्रतिदिन सिंहासन को फूलों और मालाओं से सजाया जाता है। धूप-दीप के साथ विधिवत पूजा-अर्चना होती है और सुबह तथा शाम आरती की जाती है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर मां के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं।

नवरात्र के अवसर पर मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। नौ दिनों तक पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन और कन्या पूजन का आयोजन होता है। मनोकामना पूरी होने पर भक्त मां को चुनरी, नारियल और प्रसाद अर्पित करते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि मां की कृपा से गांव और आसपास के क्षेत्रों में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

Nawada Durga Mandir: जब भक्त अपने गांव ले गया मां की प्रतिमा

मंदिर में सिंहासन पूजा शुरू होने के पीछे एक पुरानी लोककथा प्रचलित है। इस कथा का संबंध दरभंगा जिले के बहेड़ी प्रखंड स्थित हाबीड़ीह गांव के एक श्रद्धालु से बताया जाता है। कहा जाता है कि हाबीड़ीह गांव का एक भक्त प्रतिदिन कमला नदी पार करके नवादा स्थित हयहट्ट भगवती मंदिर में पूजा करने आता था। मां के प्रति उसकी श्रद्धा इतनी गहरी थी कि वह नियमित रूप से मंदिर पहुंचकर आराधना करता था। एक दिन वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। शारीरिक कमजोरी के बावजूद वह मां की पूजा करने के लिए मंदिर पहुंचा, लेकिन मुख्य द्वार पर ही बेहोश होकर गिर पड़ा।

लोककथा के अनुसार, भक्त की परेशानी देखकर मां भगवती ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए। मां ने उसे अपनी प्रतिमा अपने गांव ले जाने की अनुमति दे दी। इसके बाद अगली सुबह भक्त मंदिर के सिंहासन से मां की प्रतिमा लेकर हाबीड़ीह गांव चला गया। मान्यता है कि आज भी हाबीडीह में उसी प्रतिमा की पूजा की जाती है और वहां भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। हालांकि, ये भी कहा जाता है कि बाद में हाबीडीह से भी मां की मूर्ति कहीं और ले जाया गया।

उधर, जब नवादा के ग्रामीणों को प्रतिमा ले जाए जाने की जानकारी मिली, तो उन्होंने उसे वापस लाने का विचार किया। लेकिन लोककथा के अनुसार, उसी रात मंदिर के तत्कालीन पुजारी दामोदर गोसाई को मां भगवती ने स्वप्न में दर्शन दिए। मां ने पुजारी से कहा कि नवादा में उनके सिंहासन की पूजा की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि सिंहासन की आराधना से ही वे प्रसन्न रहेंगी। इसके बाद ग्रामीणों ने मां के इस कथित निर्देश को स्वीकार करते हुए प्रतिमा वापस लाने का फैसला छोड़ दिया। तभी से मंदिर में सिंहासन पूजा की परंपरा चली आ रही है। यही अनूठी परंपरा आज हयहट्ट देवी मंदिर को दूसरे देवी मंदिरों से अलग पहचान देती है।

Nawada Durga Mandir
Nawada Durga Mandir

Nawada Durga Mandir: नवरात्र में भक्तों की लंबी कतारें

चैती और शारदीय नवरात्र के दौरान हयहट्ट देवी मंदिर में विशेष रौनक देखने को मिलती है। कलश स्थापना के साथ ही मंदिर में श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो जाता है। नवरात्र के नौ दिनों तक पूजा-अर्चना के साथ धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों को सजाया जाता है। गांव के युवा साफ-सफाई, रोशनी और अन्य व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं। वहीं, स्थानीय महिलाओं की मंडलियां सामूहिक रूप से भजन और धार्मिक गीत प्रस्तुत करती हैं। सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। भीड़ के कारण कई बार भक्तों को दर्शन के लिए लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ता है।

दरभंगा, मधुबनी, सुपौल और सहरसा समेत मिथिलांचल के विभिन्न इलाकों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। नेपाल से आने वाले भक्त भी इस मंदिर के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त करते हैं। कई परिवारों में पीढ़ियों से नवरात्र के दौरान यहां पूजा करने की परंपरा बनी हुई है। मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के सहयोग के लिए स्थानीय ग्रामीण भी आगे आते हैं। उनके द्वारा प्रसाद, जलपान और विश्राम जैसी सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है। धार्मिक आयोजन के दौरान ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी इस स्थान की सामाजिक और सांस्कृतिक एकजुटता को भी दर्शाती है।

Nawada Durga Mandir: मिथिलांचल की आस्था और विरासत का प्रतीक

नवादा गांव का हयहट्ट देवी मंदिर धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और पारंपरिक पूजा पद्धति के कारण विशेष महत्व रखता है। यहां की सिंहासन पूजा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ी हुई है। मंदिर की स्थापना से जुड़ी मान्यताएं, हयहट्ट राजा के डीह से संबंधित ऐतिहासिक कथाएं और मां की प्रतिमा को हाबीड़ीह ले जाने की लोककथा इस धाम को एक अलग पहचान देती हैं। नवरात्र के दौरान यहां जुटने वाले श्रद्धालु मां के प्रति अपनी आस्था और विश्वास प्रकट करते हैं। सदियों से चली आ रही सिंहासन पूजा की यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। यही वजह है कि दरभंगा जिले के बेनीपुर प्रखंड स्थित नवादा का हयहट्ट देवी मंदिर मिथिलांचल के प्रमुख आस्था स्थलों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।

पत्रकार देव चौधरी की विशेष रिपोर्ट

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *