कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार के बीच सत्ता को लेकर चल रहा विवाद अभी थमता नजर नहीं आ रहा है। हाल ही में दोनों नेताओं ने हाईकमान के निर्देश पर एक-दूसरे के घर नाश्ते पर मुलाकात की थी, जिससे बढ़ते तनाव को कम किया जा सके। लेकिन इस बैठक ने भी कोई ठोस समाधान नहीं दिया। जिसकी वजह से अंदरूनी खींचतान पहले जैसी ही बनी हुई है।
कर्नाटक में चल रही कुर्सी की लड़ाई की अहाट दिल्ली तक पहुंच गई है। इससे पहले कि बात हाथ से निकल जाए, कांग्रेस नेतृत्व ने शनिवार को दिल्ली में सोनिया गांधी के 10 जनपथ आवास पर एक अहम बैठक की। इस चर्चा में राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल भी शामिल थे।
मीटिंग के बाद वेणुगोपाल ने बताया कि कर्नाटक की राजनीतिक परिस्थिति पर विस्तृत चर्चा हुई, लेकिन अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका। उन्होंने कहा कि इस विषय पर आगे भी बैठकें होंगी और पार्टी आवश्यक निर्णय लेगी। वेणुगोपाल ने यह दावा भी किया कि कर्नाटक कांग्रेस एकजुट है और पार्टी फिलहाल 14 दिसंबर को होने वाली ‘वोट चोरी’ विरोधी रैली की तैयारियों में जुटा है।
आखिर क्यों खतरे में कर्नाटक सरकार?
कर्नाटक में मई 2023 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद से यह दावा सामने आता रहा है कि मुख्यमंत्री पद के लिए ढाई-ढाई साल का पावर शेयरिंग फॉर्मूला तय किया गया था। जिसके तहत पहले ढाई साल सिद्धारमैया मुख्यमंत्री रहेंगे और आखिरी के ढाई साल के लिए डी. के शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा।
हालांकि पार्टी ने इस मुद्दे पर कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं की, लेकिन शिवकुमार के ‘सीक्रेट मीटिंग’ वाले बयान ने अटकलों को और तेज कर दिया।
20 नवंबर को सिद्धारमैया सरकार के ढाई साल पूरे होने के बाद तनाव और बढ़ गया। कई विधायकों के दिल्ली पहुंचकर नेतृत्व परिवर्तन की वकालत करने की भी खबरें आईं।
सार्वजनिक बयानों में सिद्धारमैया कहते हैं कि वे पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे, वहीं शिवकुमार दावा करते हैं कि उन्होंने कभी मुख्यमंत्री पद की मांग नहीं की और वे पार्टी के फैसले पर पूरी तरह भरोसा रखते हैं।