सूरत में बिहारी मजदूरों का ‘गांव चलो आंदोलन’, 8 घंटे की शिफ्ट और सवेतन छुट्टी की मांग; मालिकों के सामने रखीं शर्तें

सूरत (Surat Majoor Aandolan)। देश की राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आंदोलन को लेकर चर्चा के बीच गुजरात के सूरत (Surat Majoor Aandolan) में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। सूरत की कपड़ा और कढ़ाई इकाइयों में काम करने वाले बिहारी मजदूर आठ घंटे की शिफ्ट, सप्ताह में एक दिन सवेतन अवकाश और श्रम कानूनों को पूरी तरह लागू करने की मांग कर रहे हैं। दो महीने से अधिक समय से जारी यह संघर्ष अब ‘गांव चलो आंदोलन’ तक पहुंच गया है।

मजदूरों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे काम छोड़कर अपने-अपने गांव लौट सकते हैं। दूसरी ओर, उद्योग मालिकों ने भी अपनी शर्तें सामने रखी हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सूरत के कपड़ा उद्योग में काम करने वाले बिहारी मजदूर आठ घंटे की शिफ्ट का अधिकार हासिल कर पाएंगे और क्या इसके साथ उनकी मौजूदा मजदूरी भी सुरक्षित रहेगी?

बिहार क्रोनिकल के वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र की रिपोर्ट के मुताबिक, सूरत का कपड़ा उद्योग बड़े पैमाने पर प्रवासी मजदूरों के श्रम पर निर्भर है। बिहार और उत्तर प्रदेश समेत देश के विभिन्न राज्यों से आए हजारों कामगार यहां की वस्त्र और एम्ब्रॉयडरी इकाइयों में काम करते हैं। इन मजदूरों के लिए यह आंदोलन केवल काम के घंटे कम कराने की लड़ाई नहीं है, बल्कि बेहतर मजदूरी, आराम, पारिवारिक जीवन और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों की मांग भी है।

Surat Majoor Aandolan: 12 घंटे की ड्यूटी से परेशान हैं मजदूर

सूरत की एम्ब्रॉयडरी यानी कढ़ाई इकाइयों में मजदूरों का आंदोलन (Surat Majoor Aandolan) 16 अगस्त को अमरोली इलाके से शुरू हुआ था। धीरे-धीरे यह विरोध शहर के दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों तक फैल गया। मजदूर संगठनों का आरोप है कि कई औद्योगिक इकाइयों में कामगारों से लगातार 12-12 घंटे काम कराया जाता है। इसके बावजूद उन्हें सप्ताह में एक दिन सवेतन छुट्टी जैसी बुनियादी सुविधा नियमित रूप से नहीं मिलती। न्यूज लॉन्ड्री ने भी अपनी रिपोर्ट में मजदूरों की इन समस्याओं और उनके आंदोलन को विस्तार से सामने रखा है। मजदूरों की प्रमुख मांग है कि उनकी दैनिक ड्यूटी आठ घंटे निर्धारित की जाए। इसके साथ ही सप्ताह में कम से कम एक दिन सवेतन अवकाश दिया जाए। वेतन का समय पर भुगतान सुनिश्चित करने और श्रम कानूनों के तहत मिलने वाली सुविधाओं को लागू करने की मांग भी उठाई जा रही है। इसके अलावा मजदूर भविष्य निधि (पीएफ), कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई), ग्रेच्युटी और बोनस जैसे लाभ भी चाहते हैं। उनका कहना है कि लंबे समय तक काम करने के बावजूद उन्हें उन सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जो एक श्रमिक को मिलना चाहिए।

मजदूरी कम नहीं हो, आठ घंटे की हो शिफ्ट

मजदूरों की मांगों में एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी है कि काम के घंटे कम होने के साथ उनकी कमाई में कटौती नहीं की जाए। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, मजदूर चाहते हैं कि उनकी शिफ्ट आठ घंटे की हो, लेकिन उन्हें वर्तमान में मिलने वाली मजदूरी बरकरार रखी जाए। उन्हें आशंका है कि यदि काम के घंटे घटाए गए, तो कंपनी मालिक उनकी मजदूरी भी कम कर सकते हैं।

दरअसल, दूसरे राज्यों से सूरत आकर काम करने वाले इन मजदूरों के लिए कमाई का सीधा संबंध उनके परिवार के भरण-पोषण से है। बिहार में उनके परिवार उनकी कमाई पर निर्भर हैं। ऐसे में काम के घंटे कम होने के बावजूद मजदूरी में कटौती उनके लिए आर्थिक संकट पैदा कर सकती है। यही वजह है कि मजदूर आठ घंटे की शिफ्ट के साथ अपनी मौजूदा आय को सुरक्षित रखने पर जोर दे रहे हैं।

क्या है ‘गांव चलो आंदोलन’?

अपनी मांगों को मनवाने के लिए मजदूरों ने ‘गांव चलो आंदोलन’ (Surat Majoor Aandolan) का रास्ता अपनाया है। इसके तहत कामगारों से कहा जा रहा है कि यदि कंपनी मालिक उनकी मांगों को स्वीकार नहीं करते हैं, तो वे काम छोड़कर अपने-अपने गांव लौट जाएं। अक्टूबर की शुरुआत में मजदूर प्रतिनिधि अजय दुबे ने भी कामगारों से अपील की थी कि वे अपनी मांगों पर एकजुट रहें। उनका तर्क था कि यदि मजदूरों को उचित मजदूरी और सुविधाएं नहीं मिलती हैं, तो इतनी कम कमाई में सूरत में रहकर काम करने का क्या फायदा? यह आंदोलन उद्योग पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। सूरत का कपड़ा उद्योग बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिकों पर निर्भर है। यदि बड़ी तादाद में मजदूर अपने गांव लौट जाते हैं, तो उत्पादन और औद्योगिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

त्योहारों के मौसम में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मजदूरों के अपने घर लौटने की इच्छा भी इस अभियान को महत्वपूर्ण बनाती है। आंदोलन के तहत मजदूरों से श्रम अधिकारियों के पास लिखित शिकायत दर्ज कराने, अलग-अलग शिफ्ट में काम करने वाले श्रमिकों को एकजुट करने और कंपनी प्रबंधन से बातचीत करने की अपील की गई है। मांगें पूरी नहीं होने की स्थिति में प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग करने और काम छोड़कर गांव लौटने का विकल्प भी रखा गया है।

श्रम विभाग की सक्रियता, गिरिराज सिंह ने भी की पहल

मजदूरों के लगातार विरोध के बीच श्रम विभाग की सक्रियता भी सामने आई है। सितंबर के अंतिम सप्ताह में उप श्रम आयुक्त के कार्यालय से संबंधित कंपनियों को श्रम संहिताओं के पालन के संबंध में निर्देश दिए जाने की खबर आई थी। इसके बाद मजदूरों के एक वर्ग ने एक अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन टाल दिया था। हालांकि, मजदूर पक्ष का कहना है कि निर्देश जारी होने के बावजूद उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।

इस आंदोलन के दौरान अमरोली इलाके में तनाव और हिंसा की घटनाएं भी सामने आईं। न्यूज लॉन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में तीन प्राथमिकी दर्ज की गईं, आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया और करीब 500 लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए। मजदूर प्रतिनिधियों ने दर्ज मुकदमों को वापस लेने की मांग भी उठाई है। वहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया की 11 अक्टूबर की रिपोर्ट में मजदूर प्रतिनिधि अजय दुबे को पुलिस हिरासत में लिए जाने की खबर दी गई। इन घटनाओं के बाद मजदूरों और उद्योग प्रबंधन के बीच बातचीत का माहौल और संवेदनशील हो गया है।

इस बीच केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह ने भी उद्योग मालिकों से मजदूरों के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से विवाद सुलझाने की अपील की है। उन्होंने सूरत को ‘मिनी इंडिया’ बताते हुए बिहार और उत्तर प्रदेश के श्रमिकों के योगदान को रेखांकित किया। केंद्रीय मंत्री की पहल के बाद मजदूरों को उम्मीद है कि उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया जा सकता है।

मालिकों की शर्त: नुकसान की भरपाई मजदूरों के वेतन से

मजदूरों की मांगों के बीच सूरत के कपड़ा उद्योग (Surat Majoor Aandolan) से जुड़े मालिकों के संगठन टेक्सटाइल एम्ब्रॉयडरी जॉबवर्क एसोसिएशन ऑफ सूरत (टीईजेएएस) ने भी अपना पक्ष रखा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की 11 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन के प्रतिनिधियों ने कहा है कि वे नई श्रम संहिताओं को चुनिंदा तरीके से लागू करने के बजाय उनके सभी प्रावधानों को लागू करने के पक्ष में हैं। टीईजेएएस के पूर्व अध्यक्ष करुणेश रणपरिया के मुताबिक, उद्योग मालिक आठ घंटे की शिफ्ट और सप्ताह में एक दिन सवेतन अवकाश देने के लिए तैयार हैं। हालांकि, इसके साथ उन्होंने एक शर्त भी रखी है। उनका कहना है कि काम के दौरान सामग्री को होने वाले नुकसान की भरपाई मजदूरों के वेतन से की जाएगी।

रणपरिया के अनुसार, पहले इस तरह की कटौती नहीं की जा रही थी। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि कुछ मजदूर नेता श्रम संहिताओं के सभी प्रावधानों की पूरी जानकारी दिए बिना कामगारों को आंदोलन के लिए उकसा रहे हैं। इस तरह मजदूरों और मालिकों के बीच विवाद केवल काम के घंटों तक सीमित नहीं रह गया है। अब यह सवाल भी अहम हो गया है कि आठ घंटे की शिफ्ट लागू होने के बाद उत्पादन से जुड़ी लागत और नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होगी।

मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी विवाद

मजदूरों और कंपनी मालिकों के बीच बातचीत में मोबाइल फोन के इस्तेमाल का मुद्दा भी सामने आया है। मजदूर यूनियन से मिली जानकारी के अनुसार, कुछ कंपनी मालिकों की शिकायत है कि काम के दौरान श्रमिक मोबाइल फोन देखते हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। हालांकि, इस मुद्दे पर मालिक संगठन का विस्तृत और सीधा पक्ष सामने आना बाकी है। मजदूरों का कहना है कि उनकी मांगें कामकाज की व्यवस्था को बेहतर बनाने और श्रम नियमों के पालन से जुड़ी हैं। वहीं, मालिक उत्पादन, लागत और सामग्री के नुकसान को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं।

Surat Majoor Aandolan: अब बातचीत से समाधान की उम्मीद

सूरत में जारी इस आंदोलन का अगला रास्ता मजदूर प्रतिनिधियों और कंपनी मालिकों के बीच होने वाली बातचीत से तय हो सकता है। यूनियन से मिली जानकारी के अनुसार, 12 अक्टूबर को दोनों पक्षों के बीच बातचीत की उम्मीद थी। हालांकि, इस वार्ता के नतीजे को लेकर किसी ठोस फैसले की पुष्टि अभी आवश्यक है। मजदूरों को उम्मीद है कि बातचीत में आठ घंटे की शिफ्ट, सवेतन साप्ताहिक अवकाश, समय पर वेतन और श्रम कानूनों के पालन पर सहमति बनेगी। साथ ही वे चाहते हैं कि काम के घंटे कम होने के नाम पर उनकी मौजूदा मजदूरी में कटौती न की जाए। दूसरी ओर, उद्योग मालिक उत्पादन और आर्थिक नुकसान से जुड़ी अपनी चिंताओं का समाधान चाहते हैं।

फिलहाल सूरत के कपड़ा उद्योग में काम करने वाले हजारों प्रवासी मजदूरों की निगाहें इस विवाद के समाधान पर टिकी हैं। उनके लिए यह आंदोलन केवल आठ घंटे काम करने की मांग नहीं, बल्कि अपने श्रम का उचित मूल्य, परिवार के साथ समय बिताने का अवसर और सम्मानजनक जीवन हासिल करने की कोशिश है।

रिपोर्ट क्रेडिट: पुष्यमित्र, वरिष्ठ पत्रकार, बिहार क्रोनिकल की रिपोर्ट पर आधारित।

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