नई दिल्ली। रविवार को दीपावली का पावन दिन है और इसी दिन भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक, लालकृष्ण आडवाणी, अपने जीवन के सौवें वर्ष में कदम रख रहे हैं। 8 नवंबर 1927 को कराची में जन्मे आडवाणी ने 99 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस मौके पर भाजपा मुख्यालय में पूजा-हवन के साथ विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें शुभकामनाएँ दीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके जीवन और योगदान पर भावुक लेख लिखकर उन्हें याद किया।
कराची से दिल्ली तक: एक लंबा सफर
आडवाणी का बचपन कराची में बीता। देश के बँटवारे ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और वे भारत आ गए। इसी दौर में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और संगठन के लिए काम करना उनके जीवन का केंद्र बन गया। बाद में वे जनसंघ के साथ सक्रिय हुए और दिल्ली की राजनीति में अपनी पहचान बनाई। पत्रकारिता से भी उनका नाता रहा, और संगठन के विचारों को शब्दों में ढालने की उनकी क्षमता उनके राजनीतिक जीवन की एक बड़ी ताकत मानी जाती है।
जनसंघ से भाजपा तक
आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी सरकार में वे सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे। 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई, तो अटल बिहारी वाजपेयी के साथ आडवाणी इसके संस्थापकों में शामिल थे। वाजपेयी और आडवाणी की जोड़ी ने पार्टी को सीमित दायरे से निकालकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुँचाया। वाजपेयी जहाँ पार्टी का लोकप्रिय और उदार चेहरा थे, वहीं आडवाणी संगठन के शिल्पकार और रणनीतिकार माने गए।
रथयात्रा: जिसने राजनीति की दिशा बदल दी
1990 की सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा आडवाणी के राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित अध्याय है। इस यात्रा ने राम जन्मभूमि आंदोलन को देशव्यापी जनआंदोलन का रूप दिया और भाजपा को एक बड़ी राजनीतिक ताकत बना दिया। समर्थक इसे सांस्कृतिक जागरण की यात्रा कहते हैं, जबकि आलोचक इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों पर सवाल उठाते रहे हैं। इतिहास में इस यात्रा की जगह पर बहस जारी है, लेकिन इस पर कोई दो राय नहीं कि इसने भारतीय राजनीति की धारा बदल दी।
सत्ता में भूमिका
वर्ष 1998 से 2004 तक वाजपेयी सरकार में आडवाणी देश के गृह मंत्री रहे और बाद में उपप्रधानमंत्री का दायित्व भी संभाला। लंबे समय तक वे लोकसभा में भाजपा के नेता और नेता प्रतिपक्ष भी रहे। वे सबसे लंबे समय तक भाजपा अध्यक्ष रहने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। 2009 के आम चुनाव में वे पार्टी के प्रधानमंत्री पद के चेहरे भी बने।
भारत रत्न का सम्मान
वर्ष 2024 में सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। यह उनके पाँच दशक से अधिक के सार्वजनिक जीवन की स्वीकृति के रूप में देखा गया।
शुचिता और सादगी की पहचान
आडवाणी की छवि एक अनुशासित, अध्ययनशील और सादगीपसंद नेता की रही है। किताबें, फ़िल्में और लेखन उनके निजी शौक रहे। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘मेरा देश मेरा जीवन’ में अपने सफर को विस्तार से दर्ज किया है। राजनीतिक विरोधी भी उनकी व्यक्तिगत शुचिता और संगठन के प्रति समर्पण की बात स्वीकार करते हैं।
आज का दिन
सौवें वर्ष में प्रवेश के मौके पर भाजपा नेताओं ने हवन कर उनके स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना की। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन और गृह मंत्री अमित शाह समेत कई नेताओं ने शुभकामनाएँ दीं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लेख में उनके जनसंघ से भाजपा तक के सफर और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा को याद किया।
एक युग का प्रतीक
कराची की गलियों से निकलकर दिल्ली की सत्ता तक पहुँचा यह सफर सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं, बल्कि आज़ाद भारत की राजनीति के बदलते दौर की कहानी भी है। विचारधारा पर मतभेद हो सकते हैं, पर लगभग एक सदी के इस जीवन ने भारतीय राजनीति पर जो छाप छोड़ी है, उसे नकारा नहीं जा सकता।





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