UP Vidhansabha Chunav 2027: बिहार में पांच सीटें जीतकर अपनी चुनावी ताकत दिखाने वाली असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के सामने उत्तर प्रदेश में वैसी सफलता दोहराने की चुनौती है। विपक्षी गठबंधन में जगह बनाने की कोशिशों को झटका लगने के बीच सवाल है कि क्या ओवैसी की मौजूदगी 2027 के विधानसभा चुनाव में विपक्षी वोटों का समीकरण बिगाड़ सकती है?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की कोशिशें फिलहाल सफल होती नहीं दिख रही हैं। ओवैसी ने भाजपा विरोधी दलों के साथ काम करने की इच्छा जताई है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) के नेतृत्व वाले गठबंधन की ओर से उन्हें दूरी का सामना करना पड़ रहा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव एआईएमआईएम को औपचारिक गठबंधन में शामिल करने के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं।
बिहार में पांच सीटों की जीत से बढ़ा ओवैसी का भरोसा
बिहार में एआईएमआईएम नेताओं ने दावा किया था कि 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने महागठबंधन के साथ सीट बंटवारे को लेकर बातचीत की थी, लेकिन सकारात्मक जवाब नहीं मिलने के बाद पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। पार्टी ने मुस्लिम बहुल सीमावर्ती इलाकों में पांच सीटों पर जीत दर्ज की। इससे पहले 2020 के विधानसभा चुनाव में भी एआईएमआईएम ने सीमांचल क्षेत्र की पांच सीटें जीती थीं।
सीमांचल में किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिले शामिल हैं। यहां पार्टी ने खुद को उन मुस्लिम मतदाताओं के विकल्प के तौर पर पेश किया, जिन्हें राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले महागठबंधन से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की शिकायत थी। आलोचकों ने ओवैसी पर विपक्षी वोटों को बांटने का आरोप लगाया, जबकि एआईएमआईएम का कहना रहा कि वह राजनीतिक प्रतिनिधित्व के खालीपन को भर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सीमांचल के कुछ इलाकों में पार्टी की मौजूदगी से विपक्षी वोटों का बंटवारा हुआ और महागठबंधन के लिए मुस्लिम मतों को एकजुट करना मुश्किल हुआ।
यूपी में सपा के सामने ओवैसी की राह आसान नहीं
उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम के सामने परिस्थितियां बिहार से अलग हैं। बिहार के सीमांचल में पार्टी को मुस्लिम मतदाताओं का मजबूत और भौगोलिक रूप से केंद्रित आधार मिला है, जबकि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता रोहिलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध के कुछ हिस्सों और पूर्वी जिलों में फैले हुए हैं। इसके अलावा, 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद सपा भाजपा विरोधी मुस्लिम मतदाताओं के लिए प्रमुख राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरी है।
कई मुस्लिम मतदाता राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ चुनाव जीतने की संभावनाओं को भी प्राथमिकता देते हैं। इससे सपा के पक्ष में रणनीतिक मतदान की प्रवृत्ति मजबूत हुई है। ऐसे में ओवैसी के सामने चुनौती होगी कि वह मतदाताओं को कैसे भरोसा दिलाते हैं कि एआईएमआईएम को वोट देने से प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा, न कि विपक्ष की चुनावी संभावनाएं कमजोर होंगी।
इसके बावजूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश और नेपाल तथा बिहार की सीमा से सटे उन जिलों में त्रिकोणीय मुकाबले देखने को मिल सकते हैं, जहां मुस्लिम आबादी अच्छी संख्या में है और एआईएमआईएम मजबूत उम्मीदवार उतारती है। पार्टी ने 2017 और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी अकेले चुनाव लड़ा था। रिपोर्टों के मुताबिक, ओवैसी गठबंधन के विकल्प तलाश रहे हैं, जबकि सपा और कांग्रेस ने उनसे दूरी बना रखी है।
बसपा के साथ गठबंधन की चर्चा, लेकिन मायावती की अलग राह
इस बीच, मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ एआईएमआईएम के संभावित गठबंधन को लेकर भी चर्चा है। इसे कथित ‘दलित-मुस्लिम’ या ‘भीम-मीम’ फॉर्मूले से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, रिपोर्टों के मुताबिक मायावती इस तरह के गठबंधन को लेकर अब तक अनिच्छुक दिख रही हैं। बसपा की ओर से संकेत मिले हैं कि पार्टी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ना पसंद करेगी।
यदि दोनों दलों के बीच कोई चुनावी समझ बनती भी है, तो उसके दलित वोटों पर असर को लेकर सवाल हैं। बसपा का मूल जाटव वोट बैंक ऐतिहासिक रूप से गठबंधन सहयोगियों के बजाय मायावती के प्रति अधिक वफादार रहा है। अतीत में दलित-मुस्लिम गठजोड़ के प्रयोगों से भी बड़े पैमाने पर वोटों का एक-दूसरे के पक्ष में हस्तांतरण देखने को नहीं मिला है। वहीं, गैर-जाटव दलित समुदायों के मतदान व्यवहार में हाल के चुनावों में बदलाव देखने को मिला है और इनके कुछ वर्गों का झुकाव भाजपा की ओर भी रहा है।
सीमित इलाकों में मजबूत पकड़ भी बदल सकती है चुनावी तस्वीर
कुल मिलाकर, बिहार का चुनावी अनुभव बताता है कि एआईएमआईएम को किसी पूरे राज्य में बड़ी राजनीतिक ताकत बनने की जरूरत नहीं है। किसी सीमित भौगोलिक क्षेत्र में मजबूत और केंद्रित वोट आधार भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है। उत्तर प्रदेश में पार्टी ऐसा आधार तैयार कर पाती है या नहीं, यह 2027 के विधानसभा चुनाव में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।



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